|
|
|
أنـــا
الانســان
المقيـــــــم
|
|
بيــــــن
فـــــرحةِ
الجمــعِ
|
|
وحــــــــرقةِ
المنــــــــــعِ
|
|
بيــــن
لـــــذة
التـــواصل
|
|
وخــــــــواء
الــــــــــعدم
|
|
أنــــــا
القـــــلمُ
الجـــامح
|
|
الهاجر لكل
جاهٍ ومالٍ
وسلطان
|
|
أنا الذي
ربيت بين
أحضان الكلمات
|
|
مــــــــــــــن
أثـدائهــــــنَّ
رضــعت
|
|
وهنَّ
اللواتي
علمنني
السفر الى
مجالس العارفين
|
|
ومــن
أسرارهـــنَّ
علمت شغف
المعنى
بالحرف
|
|
أنـــا
الذي
يقـــــولُ
الجمـــــــال
طهـــــــــــارتي
|
|
أنـــــــا
الـــــذي
يقـــــول
الحبُّ
معــــــــــراجي
|
|
هــــذه
شريعتــــــي
|
|
أن أبوحَ
لأهــــل
الصبابة
|
|
أن أصاحبَ
البسمة الى
وهج تألقهــــــا
|
|
أن أبارك
العشق في
العاشق
والمعشوق
|
|
وأكتب
قصائــــــدي
|
|
للكائن
ولمن سيكون
|
|
في حضرة
الجنــون
|
|
لا تحسبوا
قيساً وحده
المجنون
|
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عقلي
رهينٌ لديها
|
|
لــو
أستطيع
|
|
عقدتُ
قلبي عليها
|
|
الحبُّ
نقطة بيكار
الدائرة
|
|
يعــــودُ
منهـــا
اليهـــــــا
|
|
نهضتُ
من ذهولي
ومشيت
|
|
لــو
أستطيع
|
|
أكـــــونُ
غنجَ النعاسِ
في عينيها
|
|
أكونُ
عنفوانَ
الشموخِ في
نهديها
|
|
أدورُ
كما يـــــدورُ
الـــــــــزمان
|
|
وأعــــــودُ
منهــــا
اليهـــــا
|
|
خــــــرجتُ
مــــن قفصي
|
|
لــو
أستطيع
|
|
كسرتُ
قضبــــــانَ
الجسدِ
|
|
حـــــوَّلتُ
المادة الى
طاقة
|
|
تدورتُ
تاجاً فــوق
مفرقها
|
|
يا
الهي أضعتُ
كينونتي
بدفءِ
عينيها
|
|
أمـــــا
مــــن شفيـــعٍ
لــــديها
|
|
أمــــا
مــــن وصــيٍٍّ
عليـــها
|
|
رماني
الحبُّ منك
بما رماني
|
|
وحولني
الـــى عشق
الدنــان
|
|
أبيت
اللليــل
مشتاقا
أناجــــي
|
|
بصدق
القـــول
كاذبة
الأماني
|
|
فتشهد لي
على الأرق
القوافي
|
|
وأضـــواءُ
لهيبٍ في
جنــــاني
|
|
رأيت
بوجهـــك
أقمـــــــار
تمٍ
|
|
وفـــي
أعطافك
أغصان
بــانِ
|
|
وفــــي
الخدين حمرة
جلـَّــنار
|
|
وفــوق الثغر
زهـر
الأقحوان
|
|
فيا روح
القريض خذي
هيامي
|
|
ويا روح
الغرام خذي
عنانــي
|
|
رأيتهــــا
فــــــي
الغسـقِ
|
|
هائمـــــةً
فـي الطـــــرقِ
|
|
سارحـــــــةً
كالظبــــــي
|
|
في المرج
البهيِّ
المونق
|
|
بانت شنأأأأأاشيلُ
الغــوى
|
|
مـــــن نـــــاهدٍ
لا يتقـــي
|
|
جيــــدٌ
لها مـــــن
مرمـرٍ
|
|
وقـــــامةٌ
مــــن زنبــــقِ
|
|
والصدرُ
بستــــانُ
جنـــى
|
|
مــــــاجَ
بعطــرِ
الحبـــقٍ
|
|
هــــي
حبـــي منذ
عهــــدٍ
سبقـــا
|
|
قـــــد
كتمنـــا
حبنـــــا
فانطلقــــا
|
|
قـــــد
أصبنا الوَجد
حلواً
ناعمــاً
|
|
فسلوا
الأصحاب
يوماً هل
رؤوا
|
|
بشــــراً
أكــــرم
منـــا
خلقــــــــا
|
|
فكأني
فــــي
الهـــــوى وافقتهــا
|
|
مثلما
وافــــــق
شـنُّ
طبقـــــــــا
|
|
|
لله درُّ
العـــــــــاشقين
هــــــــــمُ
|
|
اذا الجوى
هاج في الحشا
أرقوا
|
|
يرجٍّعـــــون
الآهـــــات
خافتــةً
|
|
وإن علت
مــــــــرةً
شهقــــــوا
|
|
شوقــــــاً
تهيم
القلــــوب
والهـةً
|
|
تكــــاد عنـها
الصدور
تنفلــــقُ
|
|
الحب فيهم
فطــــــرةٌ
فطـــرت
|
|
بين
التــــآلق
والجفـــى
سبـــقُ
|
|
|
إستبدي
فالهـــوى
في
شرقنــــا
|
|
ديكتاتــــورٌ
مستبــــدٌّ
يظلــــــُم
|
|
واعبثــي
فالحسن من
ميزاتـِــه
|
|
يُظهـــــرُ
الغنــــجَ
وشوقاً
يكتمُ
|
|
وافـــرحي
إن ذاب قلبي
ولهــاً
|
|
ضجَّ
فيــــه
الوجدُ صاحَ
الحـلمُ
|
|
واغرزي
بين ضلوعي
خنجراً
|
|
فزهــــورُ
الحبِّ
يرويهـــا
الدمُ
|
|
هل
نسيتِ كيف
ناغانا
الهــوى
|
|
بعنــــــاقٍ
راقبتــــــه
الأنجــــمُ
|
|
فإذا
نحـــــن
عبيــــرٌ
عاتــــــقٌ
|
|
وإذا
نحـــــن
لهيبٌ مضــــــرمُ
|
|
هكــــذا
هكــــذا
درجت
علــــــى
الحبّ
|
|
وهــــو
نـــــــورٌ
وميضــــه
كالشهــابِ
|
|
وتخيــلت
أننــــي
الشاعــــــر
الحــــــرّ
|
|
وأنـــــي
أسيــــر فـــــــوق
السحــــاب
|
|
وتبـــدَّت
لــــــيَ
الحبيبـــــة
بحــــــــراً
|
|
فهــــي
مـــاءٌ
وغيــــرها
مـن ســـراب
|
|
وفجــــأةً
تعـــــالى
العـــــواء
حــــولي
|
|
فما
ارتعت ولا
خفت من عواء
الذئاب
|
|
كيف
يرتــــاع
شـــــــاعر
الحســـــــن
|
|
عفيفٌ
بـــــريءٌ
مــــن خنى
ومعــاب
|
|
غيـــــــر
ذي
شهـــــوةٍ
أبـــيٌّ
عزيــــزٌ
|
|
غيـــــــر
ذي
مخـــــلب
وذي
أنيــــاب
|
|
هــــــو
قـــــلبٌ
مـــــن
الحنـــان
رقيقٌ
|
|
ليس
يخشى
نقــــــاؤه
مـــــــن
ضبـاب
|
|
كان
دومــاً
علـــى
سفــر
|
|
قلبٌ
لا يهدأ ولا
يستريح
|
|
من
نبضه
ينقــدح الشرر
|
|
وفي
عمقه
كبرياءٌ
جريح
|
|
|
|
كــــان
باستطــــاعته
أن يعشـــق
|
|
لكنـــه
أبــى
|
|
كان
يمكنه أن
يشرب من
الإبريق
|
|
لكنه
اختـــار
الظمأ
|
|
كان
يمكنه أن
يغيـّـــر
مصيـــــره
|
|
لكنـــه
اختــار أن
ينتهي
|
|
مــــن
حيث
ابتـــدأ
|
|
|
|
فـــــي
عينيــــــــه
رؤيـــا
|
|
وعلــــى
شفتيــــه
لهفــــة
|
|
وفـــــي
قلبـــــه
جــرحان
|
|
جرح
وطن سُيِّب
للعسس
|
|
مـــــات
فيـــــه
العقــــــل
|
|
وناحت
عليــــه
الحريـــة
|
|
وجرح
امرأة أشرق
جمالها في
قلبه
|
|
لكنها
رحــلت
|
|
وتـــــركت
لــــــه
وهــج
الســـراب
|
|
|
|
|
|
عاشقــــاً
كيف كانت
إبنــــة البلــــدِ
|
|
عذبٌ
هـواها كما
الأحلام في
السَعَدِ
|
|
تغيبُ
عمـــداً
وتبــــدو
لا
مبـــــاليةً
|
|
غنجــــاً
ودلاًّ
فدتهـــا
الروح لو
تَعُدِ
|
|
ليلــي
دمــوعٌ
وقلبي فهــو
جارحتي
|
|
واهاً
لها
غيبـــةٌ
جارت على
كبـدي
|
|
هــذا
فــؤادي فلا
أزهـــــــاره
نبتت
|
|
لا
خمــره عـــاد
للسمـَّــار
والسهــدِ
|
|
أحبـــو
بشوقي
أناجـي
خلـَّـتي
شغفا
|
|
كم
خلتها فـي
الجوى قربي
ولم أجدِ
|
|
النفس
مفجــوعةٌ
والــــدمع
منسكبٌ
|
|
لا
رغــد عيشٍ
فأوَّاهٍ
علــى
رَغـَدي
|
|
حبيبتــــي
|
|
أين
حنانــك
السحــري
|
|
أين
الشطّ فــي
بحـري
|
|
أين
الوحي في شعري
|
|
همس
الليـــل يا
حبــي
|
|
كهمس
الوَجد في
قلبـي
|
|
يثورُ
الحبُّ في
صدري يزلزله
|
|
ويهتزُّ
الصدى روحـي
ترندحه
|
|
وأشعـــرُ
نشـــوةَ
السكـــــــران
|
|
حيـــن
أحبّ
|
|
حيـــن
أهيم
|
|
حيــــن
القبـــلة
الأولــــى
|
|
أحـــسُّ
حقيقـــة
الإنسـان
|
|
شعــــورٌ
فــــي
شراييني
|
|
أحــسُّ
بــــه
سيحيينــــي
|
|
أحسُّ
به كينونتي
معنـاي
|
|
سئمت
تحجُّر
الكلمات في
شعري
|
|
سئمت
الخوف عبر
حياتنا يسري
|
|
أريــدُ
الحبَّ
أحيــــاهُ
بلا أصنــام
|
|
أريــدُ
الشعرَ
أكتبــــه
بلا
أقــــلام
|
|
أريــدُ
تنــــاغم
الألــــــوان
|
|
أريــدُ
تــــوازن
الألحــــان
|
|
أريــدُ
أن
أجـــــدَ
ذاتــــــي
|
|
وفــي
ذاتــي أرى
الإنسان
|
|
|
|
ذكريـــاتٌ
مـــن
المـــاضي
أطــلت
|
|
مـــن
خــلال
الأسى وظلم
الليـــالي
|
|
ذهـِـــلَ
الحلـــــم
فاستكـــان
فألغــى
|
|
صبـــح
وجـــه
مـــوشَّحٍ
بظـــــلال
|
|
ســأل
الشعرُ
ثغـــر
الحبيب
أيبغــي
|
|
قبلـــة
الثغـــر أم
لذيـــذ
الــــوصال
|
|
أم
قصيـــــــداً
ملــــوناً
بابتهـــــــالٍ
|
|
أم
مقــــــالا
مدبجــــــاً
بمقــــــــــال
|
|
فأجــــاب
الحبيبُ
أبغـــــي
سمُّــــواً
|
|
ونهـــــوداً
للنفس
نحــــو
المعـــالي
|
|
أبتغيـــك
مـــــن
السمـــاء
شهـــــاباً
|
|
ومـــن
الأرض
زينـــــةً
للرجــــال
|
|
لا
قيــوداً
فــي
العقــل
تقفــل
فكــراً
|
|
ولا
طقـــوساً
تُجــــرُّ
بالأغـــــــلال
|
|
أبتغيــك
فـــي سدرة
المجد
نجمــــاً
|
|
تتمشى
فــــي
عــــزَّةٍ
واختيـــــــال
|
|
أبتغيــــك
مـــــــن
الصلاة
رديفــــاً
|
|
وجــــواباً
شافيـــــاً
لكل
ســـــــؤال
|
|
بيــن
نــار
الجــوى
وشطح
الخيــال
|
|
حلـّــق
الشعــر في
سماء
الجمــــال
|
|
|
|
متســـولٌ
أنــا
|
|
أضع
رأسي على
عتبة بيت
القصيدة
|
|
وأصغــــي
|
|
أنتفض
كعصفورٍ
بلله قطـــر
النـدى
|
|
لعـــل
القصيدة
تطـــل
بـــرأسها
|
|
متعـــاطفةً
مع
تـــــوسلاتي
|
|
لعلها تقدّم
لي كلماتٍ
ملونة
|
|
تضـــيءُ
عتمـــة
عمـــري
|
|
أو
إيقــــاعا
متنـــــــــاغما
|
|
مع
حشرجـــــات
صدري
|
|
وحيـــن
يتعب رأســي
مـــن
قســـوة
العتبـــــة
|
|
تشفق
عتبة بيت
القصيدة
تأخذني بين
ذراعيها
|
|
تهدهـــدني
تدغـــــدغني
|
|
وتصرخ
عاليا حبيبي
ضمّني شمّني
تقّمصني
|
|
إنــــي
أنتظــــرك
منـــذ ألف
عــــام ونيـّـــف
|
|
|
|
وليلـــةٍ
كثيفـــــة
الضبــــاب
|
|
أظلـــم
مـــن خافية
الغـراب
|
|
كأنها
الصقيع فــي
السرداب
|
|
أو
شبحاً قد صيغ
من سراب
|
|
|
|
وقفت
فيها
وقفـــــة
المشتاق
|
|
أسأل
عتم الليل عن
أوراقي
|
|
عـن
دفترٍ في
خزنة العشّاق
|
|
عــن
بيت شعر
دافئٍ
بـرّاق
|
|
|
|
عن
ناهـدٍ
رجراجة
الردفين
|
|
أنصع
مــن سبيكة
اللجيـــن
|
|
لمياء
ملءَ القلب
ملءَ العين
|
|
كنشوة
الخمرة في
الصدغين
|
|
|
|
حديثهــــا
ســــلافة
النــــديم
|
|
وثغــــرها
من جـوهر
كريم
|
|
ضحكتها
الأنوار في
السديم
|
|
عرفت
فيهـا
لــــذة النــــعيم
|
|
ورعشة
الجنون في
العشاق
|
|
ووثبة
الحرف على
الأوراق
|
|
وأنـّة
المجروح في
الأعماق
|
|
شكــوت
صبــابتي
والحبُّ
داءٌ
|
|
وأعيـــاني
التضـرع
والنــــداءُ
|
|
فمثلــــي
مـــا
لخافقــــه
هـدوءٌ
|
|
ومثلــــي
مـــا
لمطلبــه
رجـاءُ
|
|
كأنَّ
الشـــوق
دوّارٌ بقلبـــــــي
|
|
فحيث
الإنتـــــهاء
الإبتــــــداءُ
|
|
حبيبـــي
وجهـــه
ألقٌ
خجــولٌ
|
|
كوجــه
الشمس ضرّجه
الحياءُ
|
|
صدى
نغماته ملأت
ضلوعـي
|
|
كأن
رنينهـــا
فيهــــا
الحـــداءُ
|
|
فعقلي
فكـــره
فــي الحبِّ
طهرٌ
|
|
وشعري
في الهوى
طينٌ وماءُ
|
|
يجافيني
ومــا فـي
القلب عتبٌ
|
|
فيكفينــي
التفجــــع
والبكـــــاءُ
|
|
صديقتي لا
تنبشـي جــرحاً
قديـــم
|
|
لا تلمســــي
عظمــــاً رميـــم
|
|
لا تســـــألي
ذاك الســــــؤال
|
|
أنا قد تقـــاعدت
ومــن أمـد
بعيــد
|
|
"مــن
مطاردة
العبارات
الملــونة"
|
|
"التــي
هامت على أفــق
الخيــال"
|
|
من مطاردة
العبارات
الملونة
الأصابع
والنهود
|
|
تقـــاعدت
مـــن سفـــري
الــى ألــق
العيـــــون
|
|
عبـــر بحــار
الشفق الشفــاف
والشــوق
الدفين
|
|
ما عدت أشعــر
بالجمال
يشدني نحو
الصعــود
|
|
كل النســاء
غدت لـديَّ
الى ســواء
|
|
لــــو جئتنـــي
عهـــد
الشبــــاب
|
|
لــصغت جمــــــالك
الــــــدري
|
|
افلاكـــــاً
تـــــدور
|
|
لصنعت من
شعري لك
لحناً طهور
|
|
ما حيلتي قد
جئتني وقت الغروب
|
|
فلا مــــن
طيــور ولا مــن
طيوب
|
|
يــــا ويــــح قلبــــي
|
|
مـــن سنيــن
تجمـــد مــاءً
وطيـــن
|
|
أنا لست
أدري كيف
أحيا دون
قلبي
|
|
دون فضـــاءٍ
أو رجــــاءٍ
أو حنيــن
|
|
|
|
|
|
|
|
كيف
تمشين
انعطافٌ وتثنــي
|
|
رجرجات
الردف تحت
الثوب
أنغامٌ تغني
|
|
ما الذي
أوحى الى
خطوك إغواءً
وشعرا؟
|
|
ما الذي
أهرق فوق
النحر
ريحاناً
وخمرا؟
|
|
كيف أنَّ
الثغر في
رعشته يهمس
الموعد بشرى
|
|
وحكاياتٍ
بظـــل الهدب
كم فيها
أمـــانٍ
وتمنــي
|
|
وهديلٍ
مـــن
حمــام
الصدر
لحــــنٌ
أيُّ لحـــــن
|
|
يـــا
رفاقـــي
ضاع عقلـــي
تــــاه
فنـــي
|
|
حُــرقٌ
فــــي
العيـــن
وقـــرٌ
ملءُ أذنـي
|
|
أخاطب
أيـــامي
فهـــل هــي
تسمـعُ
|
|
وأشكــــو
فـــؤاداً
بالهمــــوم
يُــــلفع
|
|
ولـــي
نهدةٌ
فــاضت
حنينـاً
وأدمعــاً
|
|
وهـــاجت
وينبــوع
الهـــوى
يتــدفع
|
|
كأني وقد
صاح الجوى
بين أضلعي
|
|
شعـــوري
لهيبٌ
والجنــان
مـــروَّع
|
|
كأنَّ
غـــرام
الحــــرِّ
شــيءٌ
محــرَّمٌ
|
|
ومـــا
عشقــــه
إلا العلــى
والتــرفع
|
|
إليك
زمــــاني
خـــذ
فـــؤاداً
سئمتــه
|
|
فإني وعن
وصــل
الغــواني
سأقطع
|
|
جلست يومـــاً
حيـــن بــاح
الفؤاد
|
|
بأشواقــــــه
للقـــــــاء
الــحبيب
|
|
فحصحص
الوجد
واستنار
السواد
|
|
ونـــادى
المنادي فهـل
من مجيب
|
|
|
|
جلست يومــــاً
حيـن حـلَّ
المساء
|
|
وقـــد هـــزّني
الــوجد ولا
مؤنسِ
|
|
إذا لفحتنــــي
ريـــــاح
الفنــــاء
|
|
تعـــــالي
لنحيّــي فـرحة
المجلسِ
|
|
|
|
سيّــــان
مـــا
أعلـــم أو
أجهـــــل
|
|
مــن غامض
الفكـر
ولغـز
الحياة
|
|
آخـــــرنا
صــــار
لنــــا الأول
|
|
من عبث
الراعين
وخبث الرعـاة
|
|
|
|
أغمض
عينـــــي
وجــلاً
خائفــــاً
|
|
مبتغيــــاً
حريـــــةً أو ســــــلام
|
|
صاح بــيَّ
العقـــل
هامساً هاتفـــاً
|
|
بغيتك
تـــراها
فقط فـــي
المنــــام
|
|
فمــن
شفتيك
ارتشفت
الرحيـق
|
|
وعـــانقت
أحـــلاميَ
الـــواثبة
|
|
ودغدغت حتــى
سنــا لهفتــي
|
|
بثغــــرك
فـــي قبلـــة
ذائبــــة
|
|
|
|
أتنسين تحت
شعــاع النجـــوم
|
|
فـــؤادي
وأشواقـــه
العـــارمة
|
|
وكيف شــربنا
كــؤوس
المنى
|
|
عطاشاً علــى
الشرفة
الحالمة
|
|
|
|
صديقــة
دربـــي ألا
تذكريــن
|
|
ســــراً
سيبقــى
بقلبــي دفيــن
|
|
وبـــوحاً
لـــه أنـــة
العــاشقين
|
|
وأيقــــاع
آهٍ يفيـــض
حنيــــن
|
|
|
|
أأنكـــرت
حتـــى مــــواعيدنـا
|
|
وصـــوت غنـــاء
مــــواويلنـا
|
|
ومــــاذا
علينــــا
ومــاذا لنــــا
|
|
فيـــا لك ظــــالمة
تظلميــــــن
|
|
ويـــا لك
طفلـــــــة
تعبثيـــــن
|
|
|
|
في صدري
شيءٌ يحترق
|
|
انفجــر
الســدُّ
بلا وعيــي
|
|
فهديــــر
شعـــورٍ
ينــدفق
|
|
أحـــلامٌ
تثـــرى
مشلعـــةٌ
|
|
وأمـــانٍ
فـــي كفي
مـُزَقُ
|
|
وحنينـــي
نــــارٌ
موقـــدةٌ
|
|
أنجـــذب
اليهـا
وألتصــقُ
|
|
وأمـــدُّ
يديــن
مضرجتين
|
|
فيمـــور
الحــزن ويندلـق
|
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في الصبح
يعذبني وطني
|
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فـي
الليــل
يعذبني
الأرقُ
|
|
والخيبـــة
خمـــرة
أيــــامٍ
|
|
منهــا
أصطبــح
وأغتبــقُ
|
|
يــا حبُّ
تعــال وخذ
بيدي
|
|
في صدري
شيءٌ يحترقُ
|
|
إنفجــــر بـــركان
التكـــــاذب
|
|
البـــلاد
تغــــرق
شيئــاً
فشيئــــاً
|
|
نهــــــر النفــــــاق
يتدفــــق
|
|
يغــــرق
الشـــوارع
والبيـــوت
|
|
ومقــاهي
العاطلين عن
العمـــل
|
|
الـــورود تـــــذوي
|
|
العصــافير
تهــــاجر
|
|
بيـــادر
القمــح
تزوبعها
الريــح
|
|
عادت
الدائرة الى
نقطـة
البيكار
|
|
طوفان نوح
الذي حدثتنا
عنه الكتب
السماوية
|
|
يعــــود الينـــا
متقمصــاً
وجهــــاً
آخـــــر
|
|
هـــا هــم
المرابــون
يفـــرون الــى
السفينــة
|
|
وأصحاب الجــــاه
والمــــال
والسمــاسرة
|
|
وقــوادي دور
البغـــاء وشـــذاذ
الآفـــاق
|
|
يركبـــون السفينـــة
وينطلقــون
|
|
وأنـــا وأنت يــــا حبيبتــــي
|
|
وكل
الشعراء
والكتاب والعاشقين
|
|
وكل
الفقراء
والفلاحين
والمطرودين
من دور المعابد
|
|
يبنـــون مـــن
أجسادهم ســداً
يلجــم مـــاءَ
الطـــوفان
|
|
يقفــون
حائطاً فــي
وجــه التيــار
|
|
يتحدون
القهـــر
يتحدون الدمـــار
|
|
كلهم
يصيحون
الموت ولا
الفرار
|
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وكان قلمــي
الذي طهـــره
الحبّ
|
|
وكان قلمــي
الذي شففـه
الانتماء
|
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يكتب سيرة
إنسان الوعي
والحرية
|
|
يكتب سيرة
مجتمع
الكفايـة
والعدل
|
|
حبيبة قلبــي
واشتياقي وحـرقتــي
|
|
جمـالك
إحسانٌ
وعطفكِ رحمتــي
|
|
مهفهفةٌ
بيضـــاء
ذات لــــــواحظٍ
|
|
بها مـــرضٌ
بالجفــن
برءٌ لعلتــي
|
|
فلـــم أرَ
مثلـــي
عاشقـــاً
متلهفـــاً
|
|
فديت
حبيبتي نبض
قلبي ومهجتي
|
|
ولــم أرَ
مثلــي فــي
الغرام
ملوعاً
|
|
هـدرت
شبابي
وارتياحي
ونعمتي
|
|
ولــو لم
أراها فــي
الخيال
كبسمة
|
|
لمتُّ حـــزيناً
لا أراها
بمقلتــــــي
|
|
هــي الوحي
إلهاماً
وذاتـي
ملاذها
|
|
هفــا بــي
اليهـا خــاطري
فتجلـَّتِ
|
|
صحبت
الدهـــر في
أدبي وفنـي
|
|
وجـــربت
الأمــور
وجــــربتني
|
|
فلم أرَ مـذ
عرفت طريق
عقلــي
|
|
سوى
الترهيب
معتلقــاً
بذهنــــي
|
|
وظلـــمٍ
وابتــــزازٍ وانغـــلاق
|
|
وإقطــــاعٍ
وتفقيــــرٍ
وحــــزنِ
|
|
وتهجيــــر
القـــريب
الــى بعيــد
|
|
وتقـــريب
الغـــريب
بدون مُـــنِّ
|
|
تجنـَّـى
الحـــاكمون
علـى بلادي
|
|
فيـــا هـــول
الظلامة
والتجنـــي
|
|
|
|
|
|
فــي البلد
المتعوس
وحـدي
|
|
وحدي على
أشواك سهدي
|
|
الهــمُّ
عــــانق
وحشتــــي
|
|
فتبــادلا
وجــــداً بوجــــدِ
|
|
الجـــــوُّ
عتــــمٌ كالــــحٌ
|
|
لا نــــور
لا نجمـات
تهدي
|
|
روحٌ
يعذبهــــا
الجــــوى
|
|
يطــــوي
سعادتهــا
ويبـدي
|
|
طيفٌ
يلــــوح
مــن الفضــا
|
|
متــــلألئاً
فــي شكل وعـــدِ
|
|
وعــــدٌ
تـــراءى
واختفـــى
|
|
عجــــلا
كبـــارقة ٍ
لرعـــدِ
|
|
لا لا
أريــــد
النــــور
إنـِّــي
|
|
أبتغــــي
ظلمـــات
حقــــدي
|
|
حقـــدي
علـــى
الزمن الذي
|
|
خادعني أو
خـــان
عهـــدي
|
|
لا
لا
أريـــــد معونـــــةً
|
|
كـــي
أستعيــد
إلــيَّ
رشـدي
|
|
|
|
|
|
حبيبتي
كيف صــرت
الى بُعـَـادِ
|
|
ففـــرُقَ
بيــن عينـــي
والرمــــادِ
|
|
فأحـــزان
الـــزمان
الى ازديــادٍ
|
|
وأفـــراح
الــــزمان
الى نفـــــادِ
|
|
كأنـــي منـــك
لم أهنــــأ
بضـــمٍّ
|
|
وشـــمٍّ
أو أرد أحلـــــى
مــرادي
|
|
زمـــانٌ
كان فيـــه
العقــلُ
جهلاً
|
|
وكان الجهـــل
فيــه مــن
الرشادِ
|
|
وكان الثغــــرُ
مغتبطـــاً
بنهــــلٍ
|
|
وكان القلـبُ
يصهــــلُ
كالجــوادِ
|
|
فكم لـــي فـي
اقترابك من
بياضٍ
|
|
وكم لـي فـي
ابتعـادك مـن
سوادٍ
|
|
الـــى
أن شلـَّعت
قلبـــي
الليالــي
|
|
فصــرت
لا أصافي ولا
أعــادي
|
|
نظــرت
اليها نظرةً
تبعث الأسى
|
|
لهــا زفـــرةٌ
موصـــولةٌ
بحنيـــنِ
|
|
يرغِّـبني
فيهـــا شمـــوخٌ
وعــزَّةٌ
|
|
وسحـــر عيـونٍ
وانكسار جفـونِ
|
|
وقـــدٌّ ربيعـــي
النســائم
حامــــلٌ
|
|
ثمـــار صدورٍ
لا ثمـــار
غصونِ
|
|
ووجهٌ جـــرى
فيــه
النعيمُ مكـللاً
|
|
بـــورد خــدودٍ
يُجتنــى بعيــــونِ
|
|
فلا أنــا
منها في عتـابٍ
وغضبـةٍ
|
|
ولا أنـــا
مــن إعــراضها
بحزينِ
|
|
ولكننـــي
أشتـــاق
منها جمــــالها
|
|
تُجـــنُّ
بــه الألبـــاب
أي جنـــونِ
|
|
كلما
هـــاجت
الذكريات
ببـــالي
|
|
عربد الشوق
في العيون
الملاحِ
|
|
وتمـــادى
الحنيـــن
أيُّ
حنيــــنٍ
|
|
بالأمـــاني
وزهــــوة
الأفـــراحِ
|
|
حين يخطو
الحبيب
خطـوَ دلالٍ
|
|
وتـُـــدق
الأقــــداح
بالأقــــداحِ
|
|
فأسقنيها
حتـــى
الثمـــالة
صاحِ
|
|
ويغنـــي
الوجـــود
لحنـاً
رخيماً
|
|
أنــــا
ثمـــلٌ
فهــل انت
صــاحِ؟
|
|
|
|
إنَّ
الــزمان ولا أقـــــول
زمانــــي
|
|
بيـــن الفــــواجع
والدمــوع
رمانــي
|
|
وأحـــــال
لذَّاتـــــي
نحيب مهلـــوسٍ
|
|
يهـــــذي فيخــلط
عــــزَّةً
بهــــوانِ
|
|
فانظــر
الــى
الخلان كيف تفــــرقوا
|
|
والـــى
بليـــغ
القـــول
كيف عصـاني
|
|
يــا دعــد
فــي
تذبيـــل
جفنيك
مقتلـي
|
|
عينـــــان واشوقــــاه ســــوداوان
|
|
لا موقعي بيـــن
الصحاب
أجـــــادني
|
|
من
سحرهـنَّ
ولا القــريض
حمانــي
|
|
لله عقلـــي
كيف
عكـَّـــر صفـــــوه
|
|
طيش
الشيـــوخ وجفـــوة
الرحمــان
|
|
قررت
أرحــــل
هيبــــةً
وكرامـــةً
|
|
لا العصر
عصري ولا
المكان
مكاني
|
|
يا صاح
عنــدنا كل
ما يغــري
|
|
ألـــق
الشموس
وزرقة
البحــر
|
|
وتلاعب
الأنسام
فـــي
زهــــرٍ
|
|
وتضــوُّع
الأحلام
فــي
العطـرِ
|
|
وتــراقص
الأشجار في
طربٍ
|
|
وتنهــــد
العشــاق
فـــي
الســرِّ
|
|
لكن
رمانــا
الدهـــر
فــي فتــنٍ
|
|
دمنـــا
علــى
أطــرافها
يجـري
|
|
فالحـــزن
يحرقنـــا
ويســـــألنا
|
|
مـــن
أنتــم
فنجيب لا
نـــدري
|
|
يــا أنت
لبنــان
أرضـاً رحت
أعشقها
|
|
دون
المـــواطن
إن ســرّاً
وإن علنــا
|
|
عشقتها
جنـــةً
فـــي
القـلب
موقعهـــا
|
|
الشرق
والغــرب
فــي
أرزاتها
افتتنا
|
|
إن لم
يجــدد
بنـــوكِ
اليـــوم
نهضتها
|
|
لا كنتِ يا
أرض لي مهداً
ولا وطنــا
|
|
لا يرتضي
العقل شـُغلاً
عن كرامتنا
|
|
في يقظة
الشعب لا
نومـــاً
ولا وسنـا
|
|
هنـــالك
العــــزُّ
والتــــاريخ يشهـدْ
|
|
أمــا
التعلـــق
بالأوطـــان
فهــو هنــا
|
|
أريــد
لأبنـــاء
العروبـــة وحـــدةً
|
|
ليست
تفــــرِّق
بينــها
الأديـــانُ
|
|
هم العرب
الأحرار لا
القيد مطبقٌ
|
|
ولا فــي
القلوب تعشش
الأضغـان
|
|
إنَّ
العروبــــة
كهفكـــم
وملاذكـــم
|
|
خسِئ
التكاذب
وانطـــوى
البهتـان
|
|
أيـــن
الذيــن إذا
المذلــة كشـــرَّت
|
|
عـــن
نابهـــا
وتطـــايرت
تيجــانُ
|
|
أيــن
الذيـــن
نشـــدّْهم ونـــعدهم
|
|
ركنـــا
إذا اضطربت
بنـا
الأركانُ
|
|
يـــا أيها
العـــرب
الذيـــن
تقسمت
|
|
شتــى
الديــــار
بهم وهــم
إخـوانُ
|
|
عــــارٌ
عليكــم
بلعكـــم
للســـانكم
|
|
وتكلمت
بلســـانها النيـــــــرانُ
|
|
إنَّ
العــــروبة
والطـــريق
ملغَّــــمٌ
|
|
غيـــر
العروبة
والطـــريق
أمــانُ
|
|
بــلادي
بلا جـدوى
تضجُّ مــن
الظلـــمِ
|
|
فلا هـــي فــي
علــمٍ ولا هــي
في حلـمِ
|
|
بلادي بـــلا
جـــدوى تضــجُّ
وتشتكــي
|
|
من الخصم في
كل الأمور
الى الخصمِ
|
|
رجــــالاتها
لا يفقهـــــون
مصــــابها
|
|
فليس لهم عــــزمٌ
يضاف الـــى
حـــزمِ
|
|
فلم يــــزل
الأحـــــرار
فيهـــــا
كأنهــم
|
|
يطــــاردهم
قهـــــر
الطغــاة
بلا جــرمِ
|
|
يعيثــــون
فــــي كل
البــــلاد
مفــــاسداً
|
|
تريـــد بهـــم
هـــــدماً يقـــود
الـى هــدمِ
|
|
فهــــل
يرتجــــى
منهم قليــــل
شهامــةٍ
|
|
وهــــل يــرتجى
منهم قليلاً
مــن الفهـمِ
|
|
يريــــدون
تغــــريب
البـــلاد
بعقلهـــــا
|
|
وتعجيمها
فاستبدلــــوا
الغُـنم
بالغـــــرمِ
|
|
ومــــا نحــــن
إلا مــن
أرومــة يعـربِ
|
|
ومــــا نحــن
إلا مــــن
غطاريفها الشمِّ
|
|
متــأوهون
كأن جمـــر
غضـاً
|
|
للشوق
بيــن
ضلوعهم يسري
|
|
فهـــم
كأنَّ
بهـــم
سنـــا
قمـــرٍ
|
|
أو مسـّهم
طــرفٌ من
السحـرِ
|
|
مــا
بــرحوا
فـــي قلبهم ولــهٌ
|
|
تغلـــي
حـــرارته
وتستشـري
|
|
فتــــوقدت
نيــــران
وجدهـــم
|
|
ما بين أعلى
الصدر
والنحـــرِ
|
|
العشـــق
دينهـــم
وديــــدنهم
|
|
مــن أجله
داسوا علـى
الجمـرِ
|
|
فــي رحلة
العقــل
يغدو الكــون
معرفةً
|
|
فكــراً
يضيءُ ظــلام
الشــك والـــريب
|
|
صحبـي وأهــلي
إذا أهديتــهم
كتبــــا
|
|
قلبــــي يصفق
في جنبــيَّ
مــن طـربِ
|
|
فـــي كل
صبح أنـــا مـن
شمسهم ألــقٌ
|
|
شمس
المحبـــة لــم
تُحجب ولــم تغبِ
|
|
فـــي كل
ليــــل
أنــا فـــي
أفقهـم قمــرٌ
|
|
نــــورٌ
يبــدد عتـم
الجهــل في الحجبِ
|
|
يـا أذن
هــل
تسمعيـن اليـوم
يـا أذنـي
|
|
صوت الأحبة
صوت الريح في
القصب
|
|
الفكــــر
فكــــران
فكـــرٌ
ناهضٌ يقــــظٌ
|
|
حــيٌّ
وفكـــرٌ
حليف
المـــوتِ
والعــطبِ
|
|
والحبُّ
حبـّــان حبٌّ يستضـــاءُ بـــهِ
|
|
بيــــن
الأنــــام
وحبُّ
اللهــــوِ
والطــربِ
|
|
الحبُّ
يخلـــق
فـــي
الانســـان
معجـــزةً
|
|
الله
أكبــــر كم
فــــي
الحبِّ مــــن
عجبِ
|
|
ســــؤالٌ
علــى شفتـــيَّ
غــريب
|
|
ترجعــــــه
نسمــــات المــغيب
|
|
لعلـــــي
أسمــــع منـــــه
بقـــايا
|
|
نــــداءٍ
خجــــول ونـــوحٍ
كئيب
|
|
ففــــي
البـــال دغدغـة اللمسات
|
|
وفـــي
الصدر حشرجةٌ ووجيب
|
|
وفي العين
فاضت سواقي الدموع
|
|
فــكل الأمــــاسي
بكــاً
ونــحيب
|
|
الى أيـن
يمضي الهــوى
والشباب
|
|
تــــرافقه
ذكـــــريات
الحــبيب
|
|
يا الحب
سأبقى في ظمئي
|
|
يسقينــي الشــوق
وأسقيـه
|
|
يا الشوق تجول
فـي فكري
|
|
شعــــراً ســأظل أغنيـــه
|
|
أشكـــو
العشاق وما
فعلـوا
|
|
والقلب صريـــع
أمانيــــه
|
|
أتــــراه محتــــارٌ
مثــــلي
|
|
مــــن وجـــدٍ
بــات
يعانيه
|
|
مــــن حــلمٍ
يحضنه بـؤسٌ
|
|
أحــداث الـــواقع
تدميــــه
|
|
أخبــــار
القــــوم تـــؤرقـه
|
|
صـــوت
الإحبــاط
يناديــه
|
|
صـــوت
التهجيــر يبكيـــه
|
|
دمـــع
الأصحاب
يواسيــه
|
|
تعبث فـــي
شَـعري ولا
تعلـــمْ
|
|
فـــي قلبـــي
نــــارٌ
تتضـرمْ
|
|
وتظــــــن القبلــــة
تهذيبــــاً
|
|
وتــــراها
مكافـــــأة
المبســمْ
|
|
وأنــــا فــــي
شــــوقٍ
أكتمــــهُ
|
|
إعتــــدت
لأشــــواقي
أكتــــــمْ
|
|
يــــا ظــــالمٌ
أنظــــر
مأســاتي
|
|
مـــن خمــر
شفاهك كم أُحــرمْ
|
|
حبيبــــي
ليتــــك لــــو
تفهـــــمْ
|
|
مــــا
الحبُّ إذا لــــم
يتــــــرجمْ
|
|
فـــي حضــرة الغبــــار
واليبــاب
|
|
رأيت نفسـي
واقفــاً بيــن
الذئـــاب
|
|
ولم أجد
حولي إلا
الرعب
والخراب
|
|
والنــــار
والبــــارود
والحـــــــراب
|
|
صحـــت بكلمتيــــن للسلطــــان
|
|
قلــت لــــه جبـــــان
|
|
حكمت
بالسجن علـيَّ
قبـل ألف عام
|
|
فــرحل
العقــل على
أجنحة القتــــام
|
|
وهيمــن
الحـــرب علـــى
الســـــلام
|
|
وفــي ضمير
النــاس
انتشر الظــلام
|
|
لبنــان
يـــا صــرخة
الوجـــع
الدامـــي
|
|
منــــذ عشــــرات
السنيـــن
|
|
أراك قابعـــــاً
فــــي
آلامـي
|
|
أدركت
اليـــوم
أنك صراخــي
|
|
بوابـــــة
فـــــرحي
وشقائـــــي
|
|
فأركض
منجذباً نحو
أحلامــي
|
|
ألبس
ثوبي القديم
الذي برائحـة
التراب
|
|
أخلع
عطــــر
المدينـة
الحديثـة
|
|
أرمــــي
قبعــــة الحضـــــارة
|
|
أعــــود
الى وجهي الجبلــــي
|
|
الــــــى آثــــــار
أقدامـــــي
|
|
أقــــدام
تاريخــــي وتراثـــــي
|
|
لبنــــان
ولــّــى
زمـــــــن المــــــوت
|
|
وعينـــــاي
تنتظـــرانك بثـــوب
الحيــاة
|
|
هل
يُسأل العائــد
الـى الحياة
بأي طريق أتى
|
|
هـــل
قطـــع بوادي
الهجــر بقدم الــروح
|
|
هـــل تـــرك نــــوادي
السلطـــة والمــال
|
|
وعاد
ليحتضن
الأرض ويشم
رائحة
التراب
|
|
هـــل
هـــو العـــريس
والعـــروس
تتبرج
|
|
تمتطي فــــرس
الحريـــة وزهــو
العدالة
|
|
والصبايا
يلاقينها
بالزغـاريد والمـــواويل
|
|
|
|
|
|
|
|
تمهــّــل
إذ تجافينـــي
|
|
فنــار
الشـــوق
تكوينـي
|
|
سأبقى
العمر في صمتٍ
|
|
وقــار
الصمت يكفينــي
|
|
فلا
أشكــي ولا أبكـــي
|
|
صدوداً
بــات يشقينــــي
|
|
أرى النــــاس
وقــد آبوا
|
|
الـــى
أرض الشيـــاطين
|
|
أراهـــم
أفسدوا
الدنيـــــا
|
|
وعاثـــــوا
بالمساكيـــــن
|
|
فيــــا
أسفـــي على
وطن
|
|
غــــدا
وكــــر ثعـــــابين
|
|
فهـــات
النــاي
واسمعني
|
|
فصوت
النـــاي
يحيينــي
|
|
يعـــزي
النفس يدنيهـــــا
|
|
مـــــن الله ويدنينــــي
|
|
أيّ
خطبٍ حــــلَّ
ذلا ونــــدمْ
|
|
فاستباح
الحسن
والسحر التهـمْ
|
|
إيــــه
لبنــــان
فجعنـــا ويلنــا
|
|
هان
مجد الأرز
والعرش
انهدمْ
|
|
مـــوجعٌ
مـــا حــلَّ
فينــا موجعٌ
|
|
قــد
تمادى الفقر
والضيم احتـدمْ
|
|
مثــل
مجد الربِّ
كنّا في
الهوى
|
|
نفهــم
الأديـــان
شعـــراً
ونغـــمْ
|
|
يــا
صديقي قــل
لنـا في بؤسنـا
|
|
أرحمــوا
العــزَّ
بتكسير الصنـمْ
|
|
موطنـــي
لبنـــان
نبغــي عـوده
|
|
عروةً
وثُقــــــى
وحبـــاً
منتظــمْ
|
|
وليعــد
أرزي يغنــــي
فرحــــاً
|
|
رافــع
الــرأس احتـــراماً
للقممْ
|
|
|
|
|
|
ذهب
الحبيب
بحسنــه وتــــرحلا
|
|
يــوم
الهــوى سكـن
الفـــؤاد
وهللا
|
|
مستكبراً
يمشي الهوينــى
غاضبــاً
|
|
أم عابثــــاً متغنجـــاً متـــــدللا
|
|
هجـــر
الديــار
وراح ينشد
غربـةً
|
|
والشعر
إن غـاب
الحبيب ترهــلا
|
|
أيــن
الــرؤى
فــي
مقلتــيَّ
كأنهــا
|
|
جمر
اللظى
والدمع يجري
جـدولا
|
|
لا
تسألينــي عــن
هـــوىً
عانيتــه
|
|
متجـــدداً
فـــي دفئــــه
مستــرسلا
|
|
وأردتــــه
والله ســــدرة
عــــــزةٍ
|
|
فجعلتـــه
فـــي بؤســـه
متسربــلا
|
|
فـــي
ثغــرك ضحكـة
إغــواءٍ
|
|
تتفتـــح
فـــي
الشفتين كـــرومْ
|
|
ويشع
العطـــر مــن
الـرغباتِ
|
|
الخضر
وطيــر
الحسن يحـومْ
|
|
كــم هـــي
لفتــــاتك
مغــــريةٌ
|
|
إغـــراء
الخبــز الى
المحرومْ
|
|
فـــي
عــــالم
عينيــــك نــــداءٌ
|
|
بريــــق
أقمـــــارٍ
ونجــــــومْ
|
|
وأنــــا
المطــرود
من البستـان
|
|
مـــن
عــالم
أفراحي
الموهـومْ
|
|
سيدتـــي
رجــــاءً قــولي
لـــي
|
|
يقتلنــي
صمتٌ صـــار
وجـومْ
|
|
سيدتـــي
إنـــــي
مشتــــاقٌ
|
|
لـذاك الإبــــريق
المختــــومْ
|
|
|
|
|
|
صبيــــة
الـدلال
والليــــــــنِ
|
|
تعيش
بيـــن المـــاء
والطيـــنِ
|
|
تسقيـك
بالأرطـال
ضحكتهــــا
|
|
والخمر
من حيــن الى
حيــــن
|
|
تعطيــك
مـــن
نظراتهــا
قبــلا
|
|
أمـــا
الغـــوى
فعطــاء مفتـونِ
|
|
لي
ذكريات في
الهوى رسمت
|
|
بستـــان
منتــــورٍ
ونسريـــــن
|
|
أحببتهـــا
سنــــةً علـــى
سنــةٍ
|
|
وفارقتنـــي
نصف مجنـــــونِ
|
|
كيف تجـــافي
عاشقـــاً أذبلت
|
|
أزهــــاره
أنــــواء تشريـــــنِ
|
|
ضيّعتُ
وجهـــــــك
موطنـــــي
|
|
أنــــــا
عمــــري
|
|
الضياع
في صغري وفـي
كبـــري
|
|
في
عزلةٍ قلبها
أقسى من
الحجـــرِ
|
|
ضيّعت وجهـــــك موطنـــــي
|
|
وخــفت منهــــا
|
|
ريـــــاح
البغـــــض إن عصفت
|
|
غيـــــوم
الظلـــــم إن
رعـــــدت
|
|
يصيــر
النـاس
أشباحاً من
البشـــر
|
|
يصير
الحيّ مثل
الميت في
نظري
|
|
ضيّعت
وجهـــــــك
موطنـــــي
|
|
قد كنت
في خاطري
كنزاً من
الدررِ
|
|
وصورة
العــــزِّ
فيــك أجمل
الصورِ
|
|
ماذا
جـــرى هل
أصبت بلعبـة
القدرِ
|
|
أبــادرها
الحيــــاة
بــــروح
عاشــق
|
|
وأفتحهـــا
علــــى
الدنيـــا
مشـــارق
|
|
أغــــازل
روضـــةً جــــذلى
تغنـــي
|
|
تصيــــر
حديقـــــةً
مـــلأى
زنابـــق
|
|
تصيــــر
صبيـــــةً
تختــــــال
دلا
|
|
وإن
غضبت عواصفٌ
أو صواعـق
|
|
عشقت
الحســــن
أتبعـــــه
سعيــــداً
|
|
وأحمــــل
فــــي بيــــادره
البيــارق
|
|
أنــــا
المفتـــون
فــي عينــي
حبيبـي
|
|
أصــــادق
|
|
أو أعاشـق
|
|
لا
أنافـــق
|
إرجعـــي
مـــن حيث
جئتِ
|
|
وانتهي
مــــن حيث
ابتدأتِ
|
|
يــــا
شقيـّـــة
|
|
جاوبــــــــي
|
|
كل
الملذات علــى
أفواهنا
|
|
تسأل عـــن
ســرّ القضيـة
|
|
أسمعينا
بعض ما تنـــويه
|
|
يــا
صاحبة النيـّـة
الخفية
|
|
هــــل
تظنيـــن
بأنـّا
|
|
بعض
نسل قد عشقنا
الهمجية
|
|
وتقـــــولين
بأنــّا
|
|
قـد
تخلقنا بخلـــق
الجـــاهلية
|
|
وبأنـّا
نحسن اللفظ
وفي أفواهنا
|
|
جـوعٌ
الى أكل
اللحوم
البشرية
|
|
نحــن
سكان الخيــام
الحجرية
|
|
نحن
أصحاب
الطروحات الغبية
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
مُت يـــا
ضميـر وكفَّ
عنـِّـي
للأبـــدْ
|
|
أتــــرك
يـــدي لا
تقتــربْ هيـّا
ابتعدْ
|
|
أتــرك
يـدي ولسوف
أحيـا فـي رغـدْ
|
|
إني
رضعت خطيئتي
من ثدي دنياي
|
|
ومـــن
وطــــنٍ مشـــرّدْ
|
|
مـن
مشرق جرّوه
للبغي
|
|
بحبــــلٍ
مـــــن
مَسـَــدْ
|
|
إنـــي
أنا الوطــن
الذي عاش
القلــقْ
|
|
لــــم
أخشــى فـــي ليلــــي
الأرقْ
|
|
بـالأمس
كنت مثقفـــاً
|
|
وكان لـــي
وهجٌ ألـــقْ
|
|
وكان
ذكري فـي
البلاد
|
|
يهيم فــي
أعلى الأفــقْ
|
|
واليــوم
صرت فجيعةً
|
|
جرحاً
تناثر في
الأفـقْ
|
|
أنطــق
فحتى الميت
في القبـر نطـقْ
|
|
لبنـــان
ملجــأ عُــرْبٍ
ركنــه حَرَمٌ
|
|
للخــائفين
إذا خطبٌ بهـــم
نـــــزلا
|
|
تهــوي
إليه وفـود
الغرب ضارعةً
|
|
ترجو
به الأمن أو
ترجو بـه
الأملا
|
|
لبنـــان
يـــا بهجـة
الدنيــا
وفتنتهــا
|
|
ويـــا
جـــواباً
إذا مــا سائــلٌ
ســألا
|
|
أخشى
عليك الردى
أخشى غـوائله
|
|
وأرتجــي
فيــك عقــلاً
يعقـل
العللا
|
|
لك الســـلام
إذا لاحت بيارقنــــا
|
|
الحسن
والزهو لا
الأشواك والطللا
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
مـــاذا
جــــرى لكِ
يــــا فتــانة
الهـُدِبِ
|
|
عهدت فــي
فيـكِ مزمـاراً
من القصبِ
|
|
تصغي
الـــى صوتـه
الأطيارُ
صامتةً
|
|
نظمـاً
مـن الشعر أو
نثراً من
الخطبِ
|
|
تهفــو
اليـــه
قلــوب
الصحب
معجبـةً
|
|
والشـــوق
ملتهبٌ
شــوقاً
مـــن
اللهبِ
|
|
نـــورٌ
مـــن
الثغــــرِ
لألاءٌ
بمبسمـــهِ
|
|
يدعـــو
الى الحبِّ
في عزمٍ وفي
دأبِ
|
|
يــا
ظالم
الثغـرِ في
غنجٍ وفــي
وهـجِ
|
|
ولا
أقـــول
بــأنَّ
الثغـــرَ
مــــن ذهبِ
|
|
يـــا
ظالم الطرف
في دعجٍ وفي
حورٍ
|
|
قلبـــي
غــدا
منهكـاً
مـــن شدّة
التـعبِ
|
|
مــن
مبلغ الصحب
أن النفس قد
بلغت
|
|
من شدة
العشق حال
النار في الحطبِ
|
|
والـــوجد
فـــاض فلا
صبرٌ
ليـــردعهُ
|
|
شجواً
من الحزن أو
شدواً من
الطربِ
|
ليت
شعـري أيرجع
الفكر حبــاً
|
|
غصبتــه
الأيــام
أيّ اغتصــابِ
|
|
فـــرحٌ
قد مضى
وأعــوام لهــوٍ
|
|
ذهبت
غيـــر
ناويات الأيـــابِ
|
|
في
صحابٍ مثل
الورود
شذاهم
|
|
وكعـــاب
يـــا لهفتــي
للكعــابِ
|
|
شاعـــرٌ
أطــربَ
الوجـود غنـاه
|
|
ناشــر
الحسـن ناصـــر
الآدابِ
|
|
شعـــره
وثبـــة
الخيــال
تهادت
|
|
بيـن
سرِّ الهــوى
وسرِّ
الشرابِ
|
|
يا صديقيَّ
أتركانـــي
ومــا بـي
|
|
أو أعيــــدا
الــــيَّ
عهـدَ
الشبابِ
|
مـا لـــي
فتنت بمسلك
النسـّـاكِ
|
|
وهجـــرت
فتنة لحظك
الفتـَّـاكِ
|
|
بالأمس
كنتِ وردتي
وصبابتي
|
|
واليوم
لم يبــقَ
سوى الأشـواكِ
|
|
كان
الوصــال
فكل شيءٍ
باسمٍ
|
|
وأتــى
الفراقُ فكل
شيءٍ باكـي
|
|
عهـدي
بنفسي شاعـرٌ
متفاصحٌ
|
|
ما لــي
يضيع الفكر
حين أراكِ
|
|
قد خفت
من حرِّ الهـوى
ولهيبهُ
|
|
وزفيـــر
مأسور بغيـــر
فكــاكِ
|
|
حتـــى
إذا فارقتنــي
بجريرتـي
|
|
ألفيتني
جسمـــاً
بغيـــر حــراكِ
|
|
فــي
كل جفن من
جفوني مـأتمٌ
|
|
ومنــاحةٌ
ونــوادب وبواكــــي
|
|
رحمــــاك
غفــراناً
فقلبي بلقـعٌ
|
|
وهوت
حياتي لأسفــل
الأدراكِ
|
|
يــا
أمــةً نسيت
ملامحـها
|
|
وأهـــزلها
الخضــــوعُ
|
|
جهــلٌ
يراودها
وتمزيــقٌ
|
|
وتشــــريدٌ
وجـــــوعُ
|
|
الكل
يرتـــع فــي
الظلال
|
|
فلا
الرؤوس ولا
الفـروع
|
|
عرفوا
بأن العروة
الوثقى
|
|
نهــــوضٌ
لا رجـــــوعُ
|
|
يــا
أمــة
التكفير
والتهجير
|
|
لا عقــلٌ
يكون ولا شفيـعُ
|
|
ويقــــال
ثــورات
الربيـعِ
|
|
فشــــاه
وجهـــك يـا
ربيعُ
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
الحــــاملون
مصيـــر قــومٍ
|
|
باســـم
أعبــــاء
الصمـــــود
|
|
الواقفون
علــى هرى
جرفٍ
|
|
يحلّــون
خــــرافات
اليهــود
|
|
أنا
كيف أصبر يا
بلاد الأرز
|
|
عــــن
هــــذا
الجمــــود
|
|
أنا
كيف ترتهــن
الكرامة
|
|
للوظيفة
والرغيف أو
النقود
|
|
شعــبٌ
يذلّـله الطغـــــاة
|
|
يســــاق
فـــي ســوق
العبيد
|
|
يعيــش
ينتظــــر
المخلــص
|
|
بعـــد تفتيــــح
الســـــدود
|
|
يا
منطق العقـل
ويـا حريتي
|
|
عودي
رجوتك ان تعـــودي
|
|
|
|
|
|
يا
موطني قــد
طال بـي
زمــن
العذاب
|
|
وشربتـــه
دمعـــاً
يمــازجه
اغتــــراب
|
|
وأخذت
أخبط مــن
سراب فــي
سراب
|
|
هي
ضربة الدهر
قضت أم
اضطراب
|
|
يـــا
موطنـــي
مـــا عــاد
فخر
الديـــن
|
|
يأتينـــا
علــــى
قــــوس
السحــاب
|
|
ذهبت
الرجــــال
مــــع
الرجــــــال
|
|
دُفـــــن
اليـــــراع مــــع الكتـــــاب
|
|
مـــال
التـــراب
بِذلــةٍ
صوب التــراب
|
|
مـــن
يفتح
البـــاب
المنيــع
ولا يهــاب
|
|
يـــا
موطني مــن
ذا يعيد الــيَّ
عقلــي
|
|
مــــن
يحمي البيت
العتيق من
الخراب
|
|
مـــن
يعيـــد لـــه
الثقـــافة
والحضـارة
|
|
الجمــــال
صـــار كمــا
القلب يبـــاب
|
|
والــــروح
قـــــد
مُــلئت
ضبــــاب
|
|
|
|
رحمــاك
يـا حرية
الكلمة
|
|
فــــي
شرقنــــا
الحــــالك
|
|
الظلم
كمَّ
شفـاهنا
الظمأى
|
|
فشرابنــــا
شائـــــك
|
|
|
|
حتى
متى حتى متى
نشقى
|
|
فــــي
شرقنـــا
الخــــانق
|
|
لا
عقلنــــا
لا حلمنـــا
يبقى
|
|
غيــــر
الأســى
الدافــــق
|
|
|
|
نبكي
على كرامـةٍ
ضاعت
|
|
فــــي
البـــــرِّ
فـــي البحــرِ
|
|
لــم
يبــقَ إلا
بعض أطــلالٍ
|
|
مــــا
الســــرُّ
يــــا ســــرّي
|
|
|
|
شـــرابنا
التهجيـــر
والفقـــرُ
|
|
وزادنــــا
التخـــــويف
|
|
مـــا
دام فـــي
أقلامنـــا
حبرُ
|
|
لــــن
نطلب الــــرغيف
|
|
|
|
صحبتــي
بالأمـس
إنـــي
ذاكـرٌ
|
|
حبكــم
والذكر في
الحبِّ
وفــاء
|
|
كم روى
شعـري حكايا
حسنكم
|
|
أيُّ
حســنٍ
جــاذبٍ
أيُّ
بهـــــاء
|
|
كــــم
تظللت بفــــيء
لطفكــــم
|
|
بيـــــن
أزهارٍ
وأنســامٍ
ومـــاء
|
|
وجمــــالٍ
فـــي
ارتقـــاءٍ
دائــمٍ
|
|
يتـــزيا كل
حيــــنٍ بــــرداء
|
|
فهــو
في ليــلٍ
سواه في ضحىً
|
|
وهو في
الصبح سواه
في المساء
|
|
بزبدين
انهضي
وارتقي
وسودي
|
|
يا
نجمــةَ الصبح
وسعــد السعودِ
|
|
أزهـــرتِ
والأرض فــي
دجاهـا
|
|
والشمس
والبــــدر
فـــي المهـودِ
|
|
|
|
قـــد
كنتِ والعــــزُّ
فـــي صبــاهُ
|
|
نــــور
حجـى ساطعــــاً
سنـــــاهُ
|
|
تحنـــــو
لحسناواتــك
الجبــــاهُ
|
|
والمنهـــل
العــذب
كثير الـورودِ
|
|
|
|
يــــا
ضحكةً فـــي
فـــم الزمـــانِ
|
|
وبلـــــدة الحــبِّ والأمــــــانِ
|
|
أمَّــلت
فيــــك
أجمــــل
الأمـــاني
|
|
فمــــن
صعــــودٍ
الـــى
صعـــودِ
|
|
|
|
بزبدين
ســودي
وازدهـي
وتيهـي
|
|
تــــوحين
بالشعـــــر وتكتبيـــهِ
|
|
مـــا
لك فـــي
الحـسن مــن
شبيـهِ
|
|
ومــا
فــي
الـــدلال
مـــن
حـــدودِ
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
لله درك
شـــــــرقُ
|
|
لله
حمـــــدٌ
وشكــــرُ
|
|
فلــن
يمسَّــك
حســنٌ
|
|
ولــن
يمسَّــك
خيــــرُ
|
|
وكل
مـا فيــك
مــوتٌ
|
|
وكل
مــــا فيـك
قبـــرُ
|
|
فالأرض
تهتــز
خوفاً
|
|
وتـُكسف
الشمس ذعرُ
|
|
والمــوت
أصبح عـزّاً
|
|
للحــــرِّ
ردءٌ
ودخــــرُ
|
|
الـــروم
فيــك
صقــورٌ
|
|
والفـــرس
نهــيٌ
وأمـرُ
|
|
جــاءوا
اليــك
سراعــاً
|
|
لهـــم
زئيـــرٌ
وهــــدرُ
|
|
فالشيــخ
يتلــــوه
قـــسٌّ
|
|
والقــسُّ
يتلـــــوه
حِبـــرُ
|
|
يـــــا
نكبــــةً
لبــلادي
|
|
فمــــا
لهــــا
مستقـــــرُّ
|
|
إبــــن
المــــروءة مـيتٌ
|
|
وقلب
ذي المـــال
صخرُ
|
|
الشـــــام
فــــرَّ
بنـــــوه
|
|
البيت
بـــــــرٌّ
وبحـــــرُ
|
|
بغــــداد
صارت
خـــراباً
|
|
فالحكــــم
يفشــــوه
ســـرُّ
|
|
ومصـــر
راحت
بعيـــداً
|
|
يـــا
قــــوم
بــل أين مصر
|
|
يا
عاشق الشعر فـي
سـرٍّ وإعــلانِ
|
|
الأفــق
يهتـــزُّ مــن
تغريد ألحانــي
|
|
يختـــال
فــي بردة
الإلهام
تجذبــــه
|
|
مواقف
العـــزِّ فــي
دارات عدنــانِ
|
|
قــم
أيها الشعر
داعب ثغــرَ
غانيــةٍ
|
|
وناغ
مــا شئت مـن
وردٍ وريحــانِ
|
|
وإن
تــزر دارة
الأحبــاب
مشرقــةً
|
|
بالحسن
تزهــو كما
أزهـــار
نيسانِ
|
|
فقف
هنــاك جــلالاً
أنت فـي حــرمٍ
|
|
أغلى
على القلب من
ماسٍ ومرجانِ
|
|
هـــي
الحبيبة فـــي
قلبـــي مـرابعها
|
|
رفقــــاً
بقلبي يــا
أهلــــي
وخلانــي
|
|
أعطيتها
خمــر كأسي
والهوى جذلٌ
|
|
يعــدو
الى الوجــد
في أقدام سكـرانِ
|
|
أعطيتهــا
مهجــــةً
غنـَّت
بلابلهـــــا
|
|
وغـــرَّدت
بيـــن أثمـــارٍ
وأغصــانِ
|
|
فبــــادرتني
بصــــدٍّ
غيــــر آبهـــــةٍ
|
|
بنبـض
قلبــــي
وأشجانــي
وأحزانـي
|
|
هــــي
الغـــواية
فــي الأنثى
مؤصلةٌ
|
|
تبغــــي
التــدلل مـــن
آن الـــــى
آن
|
|
|
هــــزَّت
النشـــوة
قلبــي
مرتين
|
|
مــذ
رأيت الورد
فوق
الوجنتين
|
|
وردةٌ
للحــسن مــــــا
ماثـلهــــا
|
|
ألـــق
التبــر ولا
صفــو
اللجين
|
|
وشعـــاع
زاد فــــي لألائــــــه
|
|
أنــــه
مـــن بسمــة
فـي الشفتين
|
|
كـم
وقفت أرتجــــي
ضحكتهـــا
|
|
كارتجـــاء
البدر في ليلـة
غيــن
|
|
لحظهـــا
لحــظ غـــزال
شــارد
|
|
أيــن
مــن يشبها
في النـاس
أين
|
|
حبهــا
فــرضٌ على
أهل الحجى
|
|
أشرقت
فيــه شموس
المشرقيـن
|
|
جمـــع
الله لهـــا
الحــسن كمــــا
|
|
جمـــع
الفوضى لأهــل
الرافدين
|
|
فكتبت
الشعــر علــويَّ
الهـــوى
|
|
ليس
فـــي الشعــر
كلامٌ بين
بين
|
|
شــوقٌ
حريريّ
الأنامـــل
فـي تموجه
لهب
|
|
مـــا
الجمــر في
قلبي انسكب
|
|
مـــاذا
فعلتِ؟
دمــــي
استفاق
|
|
عــــانقت
شففنــي
العنـــــاق
|
|
هيــا
انظري في
مقلتيَّ
فبين أجفاني
فرح
|
|
أسعدتنـــي
دهـــــراً
|
|
فنسيت
آلام
الحيـــاة
|
|
وغدوت
إبنــا
للحياة
|
|
كانت
شفــــاهك
تـــــــزرع
الجمــــرا
|
|
تحيـــي
قصيــداً
مـــــرَّ
فـــي سرّي
وتاه
|
|
شوقٌ
حريريٌّ
وثغرك ذاب في
نيران ثغري
|
|
ساءلت
نفسي ما
الجمال
|
|
شوق
النجوم الى
الهلال
|
|
بيني
وبينك مــا
الصلاة
|
|
صلة
الحـــزين
بألف آه
|
|
شطحات
صوفي في رؤاه
|
|
متلهفٌ
رؤيـــــا
الإلـــه
|
|
تمنيتـــه
لك حلمـــاً
جميـــلاً
|
|
ولحناً
من الحبِّ
ملء المدى
|
|
مشارفــه
القلب في
المشتهى
|
|
وأعرافه
العقل عطـر
الهدى
|
|
وأقمــــاره
الفـــلّ
والياسمين
|
|
ونجمــــاته
رعشــات النـدى
|
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أنـــا
يـا حبيبتي
طيف جنونٍ
|
|
سليــل
الخيـال
وليـد الصدى
|
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أهــوِّم
فـوق ورود
القـريض
|
|
كمــا
هــوَّم
الطيـر أو
غـرَّدا
|
|
حدثينـــي
مــــا شئت
أي حــديثٍ
|
|
تــــزهو
ريــــاضٌ
وينقـــر عـودُ
|
|
حدثيني
تعشب
الصحارى
وتندى
|
|
فــــي
ربيـــعٍ مـــن
البشاشة بِيْــدُ
|
|
بعض
مــا فــي
حديثنا خمـرة
دنٍّ
|
|
وشفــــاهٍ كأنهــــا العنقـــــود
|
|
لا
أبالــــي
إلا بعينيــــك
والثغـــر
|
|
وشــوقٌ
فــــي صدرنــا
يستزيــدُ
|
|
أودع
الله ســـرَّه
في حــور
العين
|
|
طريقــــاً
إليــــه
ليـس يحيــــد
|
|
حدثينــي
إرتعــاش ثغــرك
يوحي
|
|
بقــريضٍ
هـــذا هـــو
المقصــــود
|
|
إن
لم يكن رُشد
الفتــى
مطلبـاً
|
|
مــن
شعبنــا ما قيمة
الرشــدِ؟
|
|
مصــائب
الدنيـــــا
وآلامهــــا
|
|
حثـَّت
أخــا الزهد
على الزهـدِ
|
|
إنَّ
الذي المحنـــة
فـــي داره
|
|
يؤنســه
المبيت فــــي
اللحــــدِ
|
|
قــد
جـاء هذا
البؤس
مستكبراً
|
|
فالويل
في الصدر وفي
الوِردِ
|
|
يشتــاق
نيسان أهـــالي
الهوى
|
|
وإنمــا
الشــوق الـــى
الـــوردِ
|
|
لــولا
فســاد
الشوكِ في
ريحه
|
|
لم
يُثــنَ
بالطيب علــى
الــوردِ
|
|
النـــار
مــا بيــن
الجوانح أنـــورُ
|
|
رقـدت
فأيقظهـا
الحنيــن
المبكــرُ
|
|
يا
عمـرُ قـد
ذهب الشباب
وزيغه
|
|
فالقـوس
مـال ولون
شعري أغبرُ
|
|
ولقـد
سلوت عن
الشباب كما
سلا
|
|
غيـــري
ولكـــن للحــزين
تذكـُّـرُ
|
|
ونسيت
ما صنع الهوى
بحشاشتي
|
|
فالدمــع
أحــــرف
والتــأوُّه
أسطرُ
|
|
كم
قبلةٍ لك فـي
الضمائر لم
أخف
|
|
فيهـــا
المـــلام
لأنهـــــا
لا تـُـنشرُ
|
|
مــا
همَّنـــي
|
|
هات
اعتصر قلبــــي
|
|
يا
بـــاعث
الأشـــواق
|
|
يــــا
حبّـــي
|
|
بقبــسٍ
مــن نـــــور
عينينــــكا
|
|
أو
رعشةٍ مــن
سحــــر
جفنيكا
|
|
ثم
ابتدرني يــا
حبيب الـــروح
|
|
بقبلــةٍ
مـــن ثغــــرك
البـــاسمْ
|
|
بلفتـــةٍ
مــن طــرفـك
الظـــالمْ
|
|
في
حُلمي في
قلمي في جمـوح
|
|
مـــا
همَّنــي إن
لــم يكن سـلام
|
|
مـــا
دام فـــي أشواقنــــا
هيـام
|
|
فــي
الفكـر في
أعماقنا
شموس
|
|
رغــم
أسوداد الافـــق
العبـوس
|
|
فهمُّنــــا
ودأبنـــــا
الغــــــرام
|
|
وسط
المدى
المسدود
والظـلام
|
|
هــات
اسقنيها يــا
حبيبي هات
|
|
مــــن
شفــــةٍ
طيبــــة
المــذاق
|
|
كأنمــــا
رضابهــــا
التــــرياق
|
|
تـــذوِّب
المكــــان
والزمـــــان
|
|
تعـــــانقَ
المطلــــق
فــي أمان
|
|
كأنهـــــا
لليمنـــــيِّ
القــــــات
|
|
|
|
|
|
جافتــك
ســرّاً وحنـَّت
جــهارا
|
|
وهـل
تشرق الشمس
إلا نهـارا
|
|
كأن
الجمـــال
لهــــا عاشــــقٌ
|
|
يسايـــر
مـوكبها حيث
ســـارا
|
|
وللقلب
فــــي حبهــــا
لهفـــــةٌ
|
|
أبــــادرها
وأديـــــر
الحــوارا
|
|
فلــم
ألــــق منهــا
ســوى قبلةٌ
|
|
وكــررتها
فصدمت الجـــدارا
|
|
فقــالت
حنـــانيك
قلبــي لهيبٌ
|
|
يفيــض
شــراراً
ونوراً ونـارا
|
|
أحبـــابنا
جــــار الـــزمان
عليهمُ
|
|
إذ
جـــار حكمهـمُ
علــى
الأحبابِ
|
|
ما الهجر
ويحكِ قد أمتِّ
عزيمتي
|
|
وعبثتِ
فــي فرحي
وزهو شبابي
|
|
أعيــدي
الحكــم هجــر
الخلِّ ظلمٌ
|
|
فــأنت
أذقتــــه مـــــرَّ
العـــــذابِ
|
|
فــديتك
لا تغضِّــي
الطرف دوني
|
|
فطــــرفك
قبلتــــي
والثغــر
بابي
|
|
وصدرك
فاتـــحٌ
صفحـات حسنٍ
|
|
لأشــــواقٍ
يغـــصُّ بهـــا
كتــابي
|
|
وعــاذلةٍ
في الوفى لـو
درت
|
|
بجـــرح
فــــؤاديَ
لم تعــذل
|
|
أبثُّ
لهـــا همَّ
عمــرٍ مضـى
|
|
وأشكـوَ
من عمـريَ
المقبــلِ
|
|
أفـاقت
جروحـي فمن
دمعـةٍ
|
|
تسيــل
ومـــن زفــرة
تعتلـي
|
|
فيا
ربُّ رحماك
يا ذا الجلال
|
|
ويـا
ربُّ عطفــاً
فأنت العلـي
|
|
سهرت
أصوغ همومي
قريضاً
|
|
فجفنــي
بالغمــض لــم
يكحـــلِ
|
|
سكــون
الدجــى
ونزيف الفـؤاد
|
|
جنــاحان
للشاعــــر
الأعــــزلِ
|
|
حنـــانيك
ربـــي طريقـي
ظلام
|
|
وعقلــــي
يتيــــه ولـــم
تحفـــلِ
|
|
إذا
طــــاف دمــعٌ
واستجــدَّ
لهيب
|
|
تذكــــر
مشتــــاقٌ
وحـــــنَّ
حبيب
|
|
تـُــرى
عنـدها وجدٌ
وشوقٌ ولهفةٌ
|
|
كمــا
فــي فــؤادي
خفقـةٌ
ووجيبُ
|
|
لها
كبدي دوني
وعقلي
وخاطري
|
|
ونفسي
التــي أدعـــى
بها وأجيبُ
|
|
علامـــة
حبـِّــي
لوعــــةٌ
وصبابةٌ
|
|
وعنـــوان
بـؤسي زفـــرةٌ
ونحيبُ
|
|
فمـــا
فــرح الانســان
الا الذي له
|
|
شـــروقُ
خيالٍ والزمــان
غروبُ
|
|
يُـــقال
وليت أقــــوالا
تعــــزي
|
|
بمــا
فــي الصدر
من هفة
الغرامِ
|
|
ومن
لي أن أصوغ
الشوق شعراً
|
|
فــألبس
جيــــدها
عقــــد الكــلامِ
|
|
فأحــــوى
ثغـــرها وغـدا
ربيعــاً
|
|
فهــا
شفتيــن أم
قدحــــي مُــــدامِ
|
|
وأنهــد
نهــد ثديهـــا
فحسبت أني
|
|
رضيــعٌ
مـا بلغت مدى
الفطـــامِ
|
|
سألت
متــى اللقـــاء
فقيـــل حتى
|
|
يقــــوم
الميتـــون
مــــن الــركامِ
|
|
دع
الأشـــواق
تستعر استعــارا
|
|
ودمـــع
العين ينهمـــر
انهمـارا
|
|
أتهــدأ
حسرتــي وتقـــرّ
عينــي
|
|
ولــم
أوقــد مــن
الآهــات نـارا
|
|
ستذكرني
الربـوع غــداة
صبحٍ
|
|
أتيت
لـدارها أبكـــي
الديـــــارا
|
|
وقفت
على الطلول
وكنت ممـن
|
|
يعيش
الحبَّ وصـــلاً
واقتــدارا
|
|
فقد
أصبحت بعد
الهجر كهــــلاً
|
|
فلا
رأيــــا لــــديّ
ولا قــــرارا
|
|
إذا
بقـــي
الحبيب يــروم
بعـــداً
|
|
ويختـــار
الجفــاء
لنا اختيـــارا
|
|
فدنيـــاه
التصابـــي
والأمــــاني
|
|
وهادنـّـا
وسامحنــا
اضطــرارا
|
|
هـــو
التشبيب يغـــرينا
جميعــاً
|
|
يسير
الشعر حيث
الحسن سارا
|
|
|
|
|
|
|
|
دنوتِ
علــى بعـــدٍ
وباعدتِ عــن
قـُرْبِ
|
|
أأُجنـــى
بلا جـُــرمٍ
وأُقصــى بــلا
ذنبِ؟
|
|
فكيف
وأنت النــار
فــي القلب
والحشــا
|
|
فحسبي
أروِّي
القلب من
مدمعي حسبـي
|
|
أعيش
زمانــــاً
فيــــه ظلــــمٌ
وحســـرةٌ
|
|
فعينــــيَّ
والأحـــزان
سكبــاً على
سكبِ
|
|
فيــــا
لشقــــاءٍ أشتكـــي
فيــــه خلتـــي
|
|
أبثُّ
لهـــا النجـــــوى
فأظفــــر بـالعتب
|
|
فــإن
كـــان دلاً
فالــــدلال
صبـــــــابتي
|
|
وإن
كان كبـــــراً
يـــا لطــــالعه
حبـــي
|
|
أوجعت
قلبــي في
هـوى أحبابي
|
|
وهرقت
خمري فوق
مـاء شبابي
|
|
ومشيت
فـي سُبلِ
الغـواية
سادراً
|
|
متجلببـاً
بصبـــابتي
وتصـــــابي
|
|
ووقفت
مـــوقف
عـــاشق
متقحمٍ
|
|
جـــدران
قلبٍ
مقفــــل
الأبـوابِ
|
|
اللحظ
يرمينــي
بنبـــل سهـــامه
|
|
والوجـــد
يحرقني كعود
ثقـــابِ
|
|
والـــوجه
أشرق لي
وليلي مظلمٌ
|
|
والثغــر
أوعدني بطيب
رضابِ
|
|
والنهــد
أغراني بعــز
شموخـــه
|
|
فنصبت
فــي أعلى
البقاع قبـابي
|
|
والخصر
مـــال بغنجــه
مترنحاً
|
|
والردف
راح يزيــل
كل حجاب
|
|
قالت
أيندهش الفتـى
مـن حسننا؟
|
|
فضحكت
منتشياً وطــال
جوابي
|
|
إلامَ
أذوق طعم المــوت
حيــَّا
|
|
وعيـن
الوصل لا
ترنو
إليــّا؟
|
|
أفكــــر
شارداً
وأذوب وجــداً
|
|
ورأسي
غـــارقٌ فـي
راحتيـّا
|
|
ولــو
أني سعيت
لكنت أغوي
|
|
وأقلب
رشـــدها
عبثــاً
وغيـَّـا
|
|
ولكني
استكنت وليس
عجـزاً
|
|
وقلبي
قد طـــوى
الآلام طيـَّـا
|
|
يشوّقني
الحبيب بطيب
وعـــدٍ
|
|
وبعـد
الوعـد يسقط
في يديَّـــا
|
|
فمــا
قابلتهـــا
والليـــل بــــدرٌ
|
|
ولا
قابلتهــــا
تحت الثريَّــــــا
|
|
هو
المحبوب جرَّح
لي فؤادي
|
|
وأغــــرق
بالمــدامع
مقلتيَّــــا
|
|
نيــل
المطالب فــي
سعــيٍّ بلا
خفــــرِ
|
|
لا بالأمانـــي
وبالتــــأميل
للقــــــدرِ
|
|
تزيدنـــي
قســوة الأيــام
عمــق حجــىً
|
|
كأنني
العقـــل بيـــن
السمــع
والبصــرِ
|
|
ولست
أبكــــي
لشيب قــد بليت بــــه
|
|
يبكي
من الشيب من
يبكي على
الصورِ
|
|
مـــــا
أطمئـــن
علـــى
حبٍّ فــــآلفه
|
|
إلا
تكشف لــــي عــــن
ســـــرٍّ
منحـدرِ
|
|
لا
عـــــار
يلحقنــــي
أنّـــي فقيـــر
يـــدٍ
|
|
وأي
عـــــارٍ
علـــــى عيـــن
بلا حـورِ
|
|
فــإن
بلغت الــــذي
أسعـــى فمــن
جدرٍ
|
|
وإن
حُــرمت
الذي أهــــوى
فمن حــذرِ
|
|
ولو
لم أهوى
غيركِ في
شبابي
|
|
بقيت
العمــر
أهـوى
المستحيلا
|
|
شُغفنـــا
بالجمال
ونحن شــرخٌ
|
|
فلم
نظفــــر
بـــه إلا
كهـــــولا
|
|
كفـــى
بشحوب
أوجهنـــا
دليلاً
|
|
بأن
الوجــــد
أفقدنـــا
الدليــــلا
|
|
تأملنـــا
الفـــلاح
فمـــا
وجــدنا
|
|
الـــى
ملقـــاه
فــي الدنيا
سبيلا
|
|
هو
الشرق
العتيق
عــدوّ
عقـلٍ
|
|
فأجبـــرني
لأختـــار
الخمــولا
|
|
وعــاذلةٍ
فـي الوفــى
لـو درت
|
|
بجـــرح
فــــؤادي
لم
تعــــــذلِ
|
|
أبث
لكــــم
هـــمَّ
عمـــرٍ مضى
|
|
وأشكــــوَ
مــن عمــريَ
المقبلِ
|
|
أفــاقت
جروحـــي
فمــن دمعةٍ
|
|
تسيـــل
ومــن
زفــــرة
تعتلـــي
|
|
فيـــا
ربُّ رحماك
يا ذا الجلال
|
|
ويـــا
ربُّ
عطفــاً
فأنت
العلــي
|
|
سهرت
أصوغ شجوني
قريضاً
|
|
فجفنـــي
بالغمض
لـــم
يكحـــل
|
|
سكـــون
الدجـى
ونزيف
الفؤاد
|
|
جناحــان
للشاعــــر الأعــــزلِ
|
|
حنــانيك
ربــي
طريقـــي
ظلامٌ
|
|
وعقلـــي
يتيـــه
ولـــم
تحفـــــلِ
|
|
|
|
|
|
وصديقــةٍ
قــالت أيختـــار
الفتـــى
|
|
طـُرُقَ
الضلالة
والضــلال قـَتـَــامُ
|
|
لا
يرعــوي عهــد
المــودة
بيننـــا
|
|
فالعقـــل
داجٍ والفــــؤاد
ظــــــلام
|
|
ألا
ليت تذكيــراً
وذكــراً
تجمُّعـــا
|
|
كما
اجتمعت وسط
القلـوب
سهامُ
|
|
فقلت
حنــانيك
المــروءة
موردي
|
|
وحفظــي
لخلانــي
الكــرام ذِمـامُ
|
|
ولكنما
الأيـــام عــاثت
بخاطـري
|
|
وغفلــــة
ذنبٍ والذنـــوب
جســامُ
|
|
فلا
تعتبــي
إنَّ اللســـان
مقصِّــــرٌ
|
|
ولا
تعجبــي
إنَّ الحـــواس
سقــامُ
|
|
ناديتك
أيتها الحريــة
|
|
فأجـــاب الشعــــر
|
|
وآخر
طفلٍ في
المنفى يبكي
ثدي الوطن
|
|
يبكـــي
جـــوعاً
حليب الأم الدافـــئ
|
|
خريفٌ
وحشيٌّ
يتستر
|
|
خلــف
حجـــاب
الصمت المتفجــــر
|
|
وصراخاً
وضراعات طفلٍ
في الأسمال
|
|
فليسقط
عصر شعراء
الجواري
والغلمان
|
|
وليسقط
شعــر الحكــام
العسكـر
|
|
العقل
دمره زلزال
الفكر
السلفي
|
|
شعري
أورثني هذا
الحزن
القاتل
|
|
سيحزُّ
به عنقي من
أجل الفقـراء
|
|
المذلــون
المهانــون
المعذبــــون
|
|
الذين
ليس علـى
صدرهم قميص
|
|
لا
يمتلكون إلا
خوفهم
وارتهانهم
للقمة الخبز
|
|
|
|
ألا
يــا
شعــــر إنك
ترجمانـــي
|
|
فأكشف
للحبيبــة
مـــا
أعانــــي
|
|
ففي
قلبي مــن
الأشواق
نــــارٌ
|
|
وأوصــابٌ
تزلـزل لي
كيــــاني
|
|
وليــلٍ
سهــده
آهـــــات
ذكـــرٍ
|
|
لقـــد
قاسيت منها
مــا
كفـــاني
|
|
أرانــي
أزرع
الأحــلام
يأســـاً
|
|
ودمعي
فوق خدي لــو
تــراني
|
|
فيا
شعر اشتكي
أفديــك
روحي
|
|
لسانك
منــه أفصح
مــن لساني
|
|
دعْ
يــا حبيب
خطر الملامِ
|
|
قلبـــي
يتـــوق الى المـُـدامِ
|
|
قـمْ
فاسقني
شهــد
الرضابِ
|
|
ولا
تــــؤاسي
بالكـــــلامِ
|
|
لا
تبتـــدرني
بالمُـــرام
|
|
وبالأصــــول
وبالنظـــــامِ
|
|
إنــي
أريـــد
الخمر يجري
|
|
مـــن
ورائــي ومن
أمامي
|
|
وأريــــد
لثــم
الثغــر
نهـلاً
|
|
فالجـــوى
مســك
الختــــامِ
|
|
كــــي
أغنــــم
الغفــــلات
|
|
من
دهرٍ يجور
على الكرامِ
|
|
لعــلَّ
جميع هذا
الكـون يبدو
|
|
رمـــوزاً
خلفهـــا
ســرٌّ إلهي
|
|
أتابعهــا
بعقــــلٍ مستنيــرٍ
|
|
وأعطيها
اهتمــامي
وانتاهي
|
|
وأحفظُ
حبَّ
خــالقها
بقلبـــي
|
|
فليس
الحبُّ
تمتمـــة
الشفــاهِ
|
|
وليس
بخاطـري
تكديس مالٍ
|
|
ولا
هرجٌ ومرجٌ
في الملاهي
|
|
فما
شوقــي
كأشواق
الغوانـي
|
|
ولا
فعلــي
كأفعــال
الدواهـي
|
|
ما
لي أرى
الوَجد في
عينيك يلتهب
|
|
أليس
للوجــد يا
زين الصبـا
سبب؟
|
|
رأيت
طرفـــك
ملهـــوفاً
بـــرؤيتها
|
|
والشــوق
يدفــق
مــدراراً
وينقــلبُ
|
|
ذكــرت
ليلــة أمسٍ
وقت
أحضنهــا
|
|
وألثم
الثغـــر
نهــلاً
والهـوى
عجبُ
|
|
أحبهــا
صادقـاً في
الحبّ..
أعبـدها
|
|
ولا
يخـــالجني
زيـفٌ ولا
كـــــذبُ
|
|
أقسمت
بالله
إنـــي
حـــافظٌ
قسمـــي
|
|
فــي
حبها لا
تناسى أصلـه
الــذهبُ
|
|
|
|
|
|
فــي
أرض الشرق في
أرضي
|
|
اليــــأس
مريـــــرٌ كالبغــضِ
|
|
والحـــزن
يجــيء ولا
يمضـي
|
|
وحديث
النــاس
عــن
العوراتِ
|
|
عــن
شعــر
المــرأة
والعِـرض
|
|
فــي
أرض الشرق
فـي أرضي
|
|
هـــا
أنـــذا
المملــــوء
بمـــوتي
|
|
الغـــارق
فـــي
بحـَّــة
صــوتي
|
|
المدفـــون
حيـّاً
فــــي
صمتـــي
|
|
الــــواقف
فـــي
الظـــلِّ
العـاتي
|
|
فــــي
بقعــــة
وحـــلٍ فـي
ذاتي
|
|
أحلـــــم أن أكتب برفـــــاتي
|
|
حكايــــةً
أو
غنــــوةً
او ملحمـة
|
|
أحلـــم
أن أوقــظ
دنيـــا
مظلمة
|
|
|
|
|
|
مـــا
زال بـــي
شـــــوقٌ
الــــــى
|
|
الأرز
فـــــلا
تـــــأخذه منـــــي
|
|
يـــــا
أنت يــــا
ولـــد
البغـــــــاء
|
|
هــددت
بالطغيــــان ركنـــــي
|
|
نازعتني
حبَّ
التـــراب
وموطني
|
|
ورميتني
عريان مجروح
التمنـي
|
|
العتـــم
تعَّب
مقلتـيَّ
|
|
وأبعد
الأحلام
عنـِّي
|
|
حلمــي
بإنسان
العدالــة
والنهــي
|
|
حلمــي
بشـــرقٍ
مستقــرٍ
مطمئنِ
|
|
شــــرق
النهـــوض
الــى
العلـــى
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مـــن
عـــــزَّه
أعطـــي
وأجنــــي
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هــــل
لي بتحقيق
المنى
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أم
تلك أوهامي
وظنـِّي؟
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لقــد
حنـَّت
عيــون
الغيد حتى
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شجت
قلبي
الخلـيِّ من
الغرامِ
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إذا
جــذب
الحنين
فــؤاد
كهـلٍ
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فكيف
تـُــرى
فـــؤاد المستهامِ
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وليــــلٍ
توقــد
الرغبـــات
فيه
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أحــاسيساً
لتبديـــــد
الظــــلامِ
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فأمَّـتني
الــــى
العشــــاق
ريمٌ
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يعـــزُّ
علــيَّ أن
سارت أمامي
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ينازعنــي
إليهــا
شــوق نفسي
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كشـــوق
متيـمٍ
مـــن ألف
عامِ
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لا
شــيء إلا
أننــي
متغـــزلٌ
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بجمـــالها
وبسحـرها
الخلابِ
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ألقــى
مـن العينين
أنساً
جاذباً
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فأبثها
نجوى الحبيب
الصابي
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إني
رأيت الثغر
يرجف نشوةً
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كم
فيه من مرحٍ
وفيض شبابِ
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ورأيت
قـدَّاَ ليس
يمكن وصفه
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ولو
أنني
صنـَّفت ألف
كتــابِ
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فالقلب
يسأل إين
ســرّ
جمالها
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وتجيبني
الأفكار بعض
جوابِ
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إشرب
على اللذات
كأساً
مترعاً
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ســرُّ
الجمال
بقـاع كأس
شرابِ
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وطني
وطـــن
النجوم لا
أسمعُ
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فيــــه
إلا
الميجنــا
والعتــــابا
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خيــــره
فـــي يــد
الغريب فما
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قصدت
خيراً إلا
وجدت سرابا
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وطنــــي
أنِفـَـتْ
الصوادح
فيـه
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أن
تساكــن
باشقـــاً أو
غـــرابا
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وطنــي
مــا شممت
وردك إلا
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شممت
مسك الحصى
والترابا
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ومغــانٍ
ضاقت علـى
ساكنيها
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غـــادروها
وسكـَّـروا
الأبـوابا
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لا
تلمهم
فيــوم
هجـــرك
كانوا
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لحــــم
شلــــوٍ
يغـــالب
الأنيابا
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الحســن
أغــــواني
بطلـَّـــته
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والقبح
أقصى قصي منهزمِ
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والبدر
رشرش فـوق
قريتنا
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أطيــــاب
نشوتــــه
ولم أنـمِ
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كأسٌ
وطرسٌ
واليراع
رؤىً
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وسمــــاء
خيـــرٍ
ثــرَّةِ
النعمِ
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فقطفت
من ثغر الدجى
قبـلاً
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معسولــــةً
أنــــداؤها
بفمــي
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وإذا
بنجـمٍ
غــار في
حضني
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متـــرنحاً
فـــي شكـلٍ
مبتسمِ
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يا
صاحبي إنَّ الهوى
ضُرَماً
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وأنا
العشيق أذوب
في الضُرُمِ
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إلامَ
أذوق طعــم
المــوت
حيـَّــا
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وعيــن
الــوصل لا
ترنـو
إليَّــا
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أفكـــر
شـــارداً
وأذوب
وجــدا
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ورأسي
غـــارقٌ
فـــي
راحتيَّــا
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ولــو
أنـي سعيت
لكنت أغـوي
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وأقلب
رشدهـــا
جهــلا
وغيـَّــا
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ولكنــي
استكنت وليس
عجــزاً
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وقلبــي
قد طوى
الأشواق
طيَّـا
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يمنينــي
الحبيب بطيب
وعــــدٍ
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وبعــد
الوعــد
أسقط فــي
يديـَّـا
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فمـــا
قبَّــلتها
والليــــل
بـــــــدرٌ
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ومــــا
عـــانقتها
تحت
الثــــريَّا
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هو
المحبوب
جــرَّح لـي
فؤادي
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وأغــــرق
بالمدامــع
مقلتيـَّـــــا
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مَـــــن
أنتِ ... كيـــف
أتيتِ
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ما
أغراكِ.. ما
أبصرتِ
فيَّ؟
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فــــي
مقلتيــك
أرى الشباب
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يفيــــض
تحنــــاناً
سخيـَّــــا
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وأرى
الجمــــــال
تألقـــــــاً
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وتبــــرُّجاً
حـــــرّاً
شهيـََّــــا
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ألممتِ
كـــــل
غـــــــــوايةٍ؟
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وسكبتها
سحـــــراً
عليَّــــــا
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مهـــــلاً
فــــداك
الطـــــرف
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يذرف
دمعـــه
جمـــراً
شقيَّـا
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مهــلاً
فإنــي شاعر
الإبـداع
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كم
روَّضت
إلهـــاماً
عصيَّـا
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أنــا
أعيش فـــي
بـــلاد الجهــــل
دون فكــــر
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قابلني
فكري ولكني
تجاهلت وعدت
دون فكر
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أنــــا
أتيت مــــن
بــــلاد
المــوت دون مـوت
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حيـــن
رآنــــي
المــوت لم
يجد لديّ ما
يميتـه
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وعشـت دون
مــــوت
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أجبرت
أن أحيا بلا
أبعاد
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أجبرت
أن أحيا بلا
آماد
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أجبرت
أن أحيا على
الحياد
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أنـــــا
الذي
أحيـــا
بظلـّــــي
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ومــــن
يعِش
بظلــــه
يمشـي
الــــى
صليبـــه
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يصلبه
روتين
أخـلاق
العبيد
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تُسمل
عيناه بسيفٍ
من جليد
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يعيش
فـــي
ماخــــور
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إسمه
الحلال
والحرام
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وينفــق
الأيــــام
فـــي
القعــــود
والقيـــــام
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لحضــــرة
السلطـــان
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هتفت
بــيَ
الأهـــواء
فاستيقظت
مـــن
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نومــــي
علـــى
قلـــقٍ
مـــن
الأهـــواءِ
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ونظــــرت
فـــي
آفـــاق
قلبــي فلم
أجد
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إلا
عويــــل
البــــؤس
والأصــــداءِ
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والدمع
يجري في
اصطحاب
الحزن لا
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يرضــــى
بهــــدأة
لحظـــــةٍ
لنـــــدائي
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ناديتهـــــا
أحبيبتي
فتلفتت
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كتلفت
الأطيــاف
للشعراء
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مذعــــورةً
تخشى
الزمـــــان
وأهلــــه
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زمـــنٌ
لعــــوبٌ
عاهـــــرٌ
ومرائـــــي
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نــــاشدت
فيهـــــا
لهفتــــي
وصبــابتي
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فأجـــابني
حلمــــي
ووحـــي
رجائـــي
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طال
انتظاري في
الظلام ولم
أزل
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متـــرقباً
طيــف
الحبيب
الزائـــــرِ
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وتــــرُّف
روحــــي
لهفـــةً
وكأنها
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في
العتم تومض
عن شهابٍ
غائرِ
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ليـــلٌ
مـــن
الأشواق خلت
كأننـي
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متسمِّعٌ
دقـَّــات
قلبــــي
الثائـــــــرِ
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حتـَّـى
إذا هتفت
بمقدمـــكِ
السمــا
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وأخذت
أمــلأ من
خيالكِ
ناظــري
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أيقنت
أنــــي
شاعــــــرٌ
بسليقتـــي
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عينـــــاي
تـــرقب كل
حسنٍ عابـرِ
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هــاتي
الصبابة يا
محبوبتي
هــــاتي
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وأشعلي
الوَجـــدَ
نــاراً بين
آهــــاتي
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وباركي
شـــوق
حبــي
للجمال
ففــي
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قلبي
خفـــوقٌ
لذاك الســرِّ
في ذاتــي
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حبيبتي
أنت.. هل للشعر
قد رقصت
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تلك
الشفـــاه
علـــى نبض
الصبابات
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هـــل
غـــرّدت
بخيالي
فكرةٌ جنحت
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فمـــا
التفكـــر
إلا مــــن
خيـــــالاتي
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قلبــي
مع الشعر
أحضنه
ويحضنني
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بذكريـــاتي
وترنيمــــي وأنـّــــاتي
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فهـــــو
الحـــرارة فـــي
قلبي بنهدته
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وهــــو
التجــوهر
في بؤسي
ولذّاتي
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أحيــــا
مع الشعـــر
ينشدني
وأنشـده
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الحسـن
غايتــــه
القصــوى
وغاياتي
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يـــا
أيهـــا
العربــــي قـُـــمْ
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وادفن
ضميرك في
الصدور
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إيــــاك
مـــن عشق
السيـادة
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فهـــــي
بهتـــــانٌ وزور
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لا
تحلمـــــنَّ
بالعـــــدالة
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فهـــــي
شـــــرٌّ
مستطيـــر
|
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لا
تحتـــــرم
عقـــلاً
لديـــك
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أخــاف
يكــــرهك
الأميـــر
|
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إيـــاك
مـــن ذكر
العروبـة
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فهـــــي
داعيـــــة
الثبــــور
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إحذر
جمال اللحـن
والوجه
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أو
العينين أو
نبض الشعور
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إيــــاك
تمشي فــي
المروج
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والتحــــرك
وســــط
نــــور
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إيــــاك
والحريــة
الحمــراء
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بحـــــرٌ
مــــن
شـــــرور
|
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لا
تتركـــــنَّ
قلبــــاً يحبّ
|
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أو
دمـاغـــــاً
يستنيـــــر
|
|
لا
تصحب
العقــل
المفكـــر
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واكتفــــي
مضـــغ
القشــور
|
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القــلب
والعقـــــل
السليـــم
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مــــن
أضاليـــــل
الغـــرور
|
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مهلا
حنــانك أيهــا
القــلبُ
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فِـــيَّ
جــروحٌ
مــا لها
طِبُّ
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هلا
ذكرت الصحب
منتحباً
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لا
الدار
دانيـةٌ ولا
الصحبُ
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هي
خلـّــتي
فــي قلبها
لهبٌ
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ومن الجفون
السحر
ينصبُّ
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كنـّـا
السعــادة
فــي
تعــانقنا
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والثغر
حلــو
المجتنى
عذبُ
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والخمــر
مهـــدورٌ
ومنسكبٌ
|
|
فــوق
الشفاه كما
بكت سحبُ
|
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أفمــا
رأيت
بطـــرفها
ولهـــاً
|
|
وبثغـــرها
يُستسهـل
الصعبُ
|
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وحبيبتــي
نــــارٌ مــؤججةُ
|
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وحقيقــةٌ
مــــا
شابها
كــذبُ
|
|
فالحب
نــــورٌ
ضمّــه
القلبُ
|
|
قــد
حــار فــي
تعريفه
اللبُّ
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